अजब ग़ज़ब रोचक

अखण्ड भारत के महान सम्राट अशोक का इतिहास | History of Ashoka In Hindi

History of Ashoka in Hindi: इतिहास के सबसे शक्तिशाली और ताकतवर योद्धा में जाने जाने वाले महान सम्राट अशोक का जन्म 304 ई पू में बिहार के पाटलिपुत्र नामक स्थान पर हुआ था। हालांकि जन्म तारीख का कोई पुख्ता प्रमाण अभी तक उपलब्ध नही है। बता दें मौर्यवंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य के पोते के रूप में अशोक जाने जाते हैं। इस तरह से मौर्य साम्राज्य के तीसरे सम्राट अशोक थे। अशोक के पिता का नाम बिंदुसार था तथा माता का नाम सुभद्रांगी था। लंका की परंपरा के अनुसार अशोक के पिता बिंदुसार की 16 पटरानियां और 101 पुत्र थे। लेकिन इतिहास में बिंदुसार के विशेष रूप से तीन ही पुत्रों का उल्लेख मिलता है – अशोक, सुशीम तिष्य। अशोक सम्राट का पूरा नाम देवानाम्प्रिय अशोक मौर्य।

History of Ashoka in Hindi

अशोक, मौर्य साम्राज्य का तीसरा सबसे शक्तिशाली राजा था। ऐसा बताया जाता है कि महान अशोक सम्राट को एक कुशल सम्राट बनाने में आचार्य चाणक्य का महत्वपूर्ण योगदान था। आचार्य चाणक्य ने ही अशोक के अंदर सारे गुणों को विकसित किए थे। अशोक सम्राट ने 269 ई पू से 232 ई पू तक प्राचीन भारत में शासन किया था। मौर्य राजवंश का चक्रवर्ती सम्राट अशोक अखंड भारत पर शासन किया था। उसका शासन मौर्य साम्राज्य उत्तर में हिंदूकुश की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी दक्षिण तक तथा मैसूर तक तथा पूर्व में बांग्लादेश से पश्चिम में अफगानिस्तान, ईरान तक शासन किया था। अगर वर्तमान की बात करें तो सम्राट अशोक का साम्राज्य भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान व म्यांमार के अधिकांश भूभाग पर रहा होगा। विश्व के सभी महान और शक्तिशाली सम्राटों के सूची में चक्रवर्तिन अशोक सम्राट का स्थान शीर्ष पर रहा है। अशोक सम्राट भारत के सबसे शक्तिशाली और महान सम्राट के रूप में जाने जाते हैं। इसीलिए सम्राट अशोक को चक्रवर्ती सम्राट अशोक के नाम के तौर पर जानते हैं। चक्रवर्ती सम्राट का मतलब है सम्राटों का सम्राट और यह स्थान भारत में किया सम्राट अशोक को ही प्राप्त है। 

File:King ashoka.jpg

सम्राट अशोक को अपने साम्राज्य के कुशल प्रशासन के अलावा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भी जाना जाता है। अशोक ने ही एशिया में तथा अन्य सभी एशिया के देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार करवाया था। आज भी सम्राट अशोक के ऐतिहासिक साक्ष्य की जानकारी सबसे अधिक है। अशोक सम्राट को प्रेम सहित, सत्य, अहिंसा, शाकाहारी जीवन प्रणाली के सच्चे समर्थक के तौर पर जाना जाता है। इतिहास में सम्राट अशोक का नाम एक महान परोपकारी सम्राट के रूप में दर्ज है।

बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार –

बताया जाता है कि कलिंग युद्ध से करीब 2 साल पहले ही सम्राट अशोक भगवान बुद्ध की मानवतावादी शिक्षा से प्रभावित होकर बौद्ध धर्म के अनुयायी हो गए थे। इस संदर्भ में उन्होंने कई स्तंभ बनवाये। आज अशोक के स्तंभ नेपाल मे बुद्ध के जन्मस्थान लुंबनी महादेवी मंदिर के पास, सारनाथ बौद्ध मंदिर, बोधगया, कुशीनगर, श्रीलंका, थाईलैंड जैसे देशों में भी अशोक के स्तंभ है। सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफगानिस्तान, पश्चिमी एशिया में और यूनान में भी करवाया था। अशोक अपने पूरे जीवन काल में एक भी युद्ध नही हारा है। सम्राट अशोक ने अपने शासन के समय देश में कई विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, जिसमें तक्षशिला विश्वविद्यालय, नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय, कंधार विश्वविद्यालय प्रमुख रूप से शामिल है। शिलालेख का काम सम्राट अशोक के समय से ही प्रारंभ हुआ। सर्वप्रथम अशोक ने बौद्ध धर्म का सिद्धांत लागू करवाया था।

आरंभिक जीवन –

अशोक सम्राट बिंदुसार तथा रानी धर्मा का पुत्र था। लंका की परंपरा के अनुसार अनुसार बिंदुसार की 16 पटरानिया और उनके 101 पुत्र थे। अशोक बिंदुसार का दूसरा बेटा था। अशोक जब छोटा था तभी धर्मा को स्वप्न आया कि उनका बेटा एक बहुत बड़ा साम्राट बनेगा। रानी धर्मा क्षत्रिय समाज से संबंध नही रखती थी। इसलिए उनका कोई विशेष स्थानों राज्य में प्राप्त नही था। अशोक ने बचपन मे अपने भाइयों स कड़ी प्रतिस्पर्धा की है। बताया जाता है कि वह बचपन से ही युद्ध गतिविधियों में प्रवीण था। अशोक शासनकाल में उकेरा गया प्रतीकत्मक चिन्ह जिसे आज अशोक का चिन्ह के रूप में जाना जाता है, आज भारत का राष्ट्रीय चिन्ह है। बौद्ध धर्म के इतिहास में गौतम बुद्ध के बाद सम्राट अशोक को महत्व दिया गया है। दिव्यधाम में अशोक की एक पत्नी का नाम तिष्यरक्षिता लिखा गया है। अशोक के एक लेख में उनकी पत्नी का नाम करूणावकि है। 

अशोक का साम्राज्य –

अशोक का जेष्ट भाई सुशीम तक्षशिला का प्रान्तपाल था। तक्षशिला में उस समय भारतीय यूनानी मूल के बहुत सारे लोग रहते थे। सुशीम के अत्याचारी प्रशासन के कारण विद्रोह उत्पन्न हो गया तब बिंदुसार ने विद्रोह के दमन के लिए अशोक को वहां भेजा। अशोक के आने की खबर सुनकर विद्रोहियों ने उपद्रव खत्म कर दिया और बिना युद्ध के ही विद्रोह समाप्त हो गया। हालांकि अशोक के शासनकाल में फिर से विद्रोह शुरू हुआ तहस पर उसे बलपूर्वक कुचल दिया गया था। अशोक की प्रसिद्ध से अशोक के भाई सुशीम को लगता था कि वह सिंहासन नहीं प्राप्त कर सकेगा तो षड्यंत्र के तहत सुशीम ने सम्राट बिंदुसार से कह कर अशोक को निर्वात में डाल दिया और अशोक कलिंग चला गया। वहां पर अशोक को मत्स्य कुमारी कौर्वकी से प्रेम हो जाता है। अशोक ने उसे अपनी दूसरी या तीसरी रानी बनाया था। इसी बीच उज्जैन में विद्रोह होता है और बिंदुसार अशोक को निर्वासन से बुलाकर विद्रोह दबाने के लिए भेज देते हैं।

इतिहास में कहा जाता है कि सुशीम के शासन से तंग आकर लोगों ने अशोक को  सिंहासन हथियाने के लिए प्रोत्साहित किया। सम्राट बिंदुसार उस समय वृद्ध हो गए थे। उसी समय अशोक को पता चला कि उसकी मां को उसके सौतेले भाइयों ने मार डाला है। तब अशोक गुस्से में महल में जाकर अपने सारे सौतेले भाइयों की हत्या करके सम्राट बन जाता है। सम्राट बनते ही अशोक ने पूर्व तथा पश्चिम दोनों दिशा में अपने साम्राज्य को फैलाना शुरू कर दिया। आधुनिक असम से लेकर ईरान तक अशोक ने अपने राज्य का विस्तार मात्र 8 सालों में ही कर लिया था।

कलिंग की लड़ाई – 

चक्रवर्तिन अशोक सम्राट 261 ई पू में कलिंग पर आक्रमण किया था। अशोक के 13वें शिलालेख के अनुसार कलिंग युद्ध में एक लाख 40 हजार व्यक्ति बंदी बनाकर निर्वासित कर दिए गए थे तथा एक लाख लोगों की हत्या कर दी गई थी। 1.5 लाख लोग घायल हुए थे। सम्राट अशोक ने यह नरसंहार खुद देखा था। इसके बाद उसने बौद्ध भिक्षु से उपाय पूछा और कलिंग के युद्ध से द्रवित होकर महान सम्राट अशोक ने शांति सामाजिक प्रगति तथा धार्मिक प्रचार का काम शुरू किया। कहा जाता है कि कलिंग का युद्ध अशोक का हृदय परिवर्तन कर देता है और उसके हृदय में मानवता के प्रति दया व करुणा आ जाती है और वह सदा के लिए युद्ध न करने का प्रतिज्ञा करता है। कलिंग युद्ध के बाद ही आध्यात्मिक और धर्म विजय का शुरू होता है। बाद में अशोक बौद्ध धर्म को स्वीकार करता है। दिव्यदान के अनुसार महान सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म की दीक्षा उपगुप्त नामक बौद्ध देशों ने दी थी।

कलिंग युद्ध बाद पश्चयताप  – 

कलिंग युद्ध के पश्चात अशोक का मन युद्ध से उठ गया। अंत में उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया। कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने शिकार तथा पशुओं की हत्या भी छोड़ दिया। ब्राह्मण व अन्य संप्रदायों के सन्यासियों को खोलकर दान देता था। जनकल्याण के लिए अशोक के चिकित्सालय, पाठशाला और सड़कों का निर्माण कराया। अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र और पुत्रियों को भी भेजा था। बौद्ध धर्म का सबसे अधिक प्रचार अशोक के पुत्र महेंद्र ने किया। महेंद्र ने श्रीलंका के राजा बौद्ध धर्म में दक्षिणा दी और इसने बौद्ध धर्म को अपना राष्ट्रीय धर्म बना लिया। अशोक के शासनकाल में ही पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ था जिसके अध्यक्ष मोगली पुत्र तिस्या ने की थी। यहीं पर अभिधम्म पिटक की रचना की गई थी।

अशोक के शिलालेख –

अब तक अशोक के कुल 23 अभिलेख मिले हैं जिसमें अशोक स्तंभ, चट्टानों और गुफाओं की दीवारों पर 269 – 231 ई पू तक के शासनकाल को अशोक ने लिखवाया है। यह अशोक स्तंभ बांग्लादेश, भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल में मिले हैं। यहीं से बौद्ध धर्म के अस्तित्व के सबसे प्राचीनतम प्रमाण भी मिले हैं। शिलालेखों के अनुसार अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए भूमध्य सागर के क्षेत्र तक सक्रिय था। 

File:Ashoka's visit to the Ramagrama stupa Sanchi Stupa 1 Southern gateway.jpg

सम्राट अशोक मिश्र और यूनान की राजनीतिक परिस्थितियों से परिचित था। पूर्वी क्षेत्रों में पाया जाने वाला शिलालेख मगधी भाषा में ब्राह्मी लिपि में लिखी गए हैं। पश्चिमी क्षेत्र में पाए गए शिलालेखों की भाषा संस्कृत से मिलती है और खरोष्ठी लिपि में लिखा गया है। कुछ शिलालेख में यूनानी भाषा का उल्लेख है।

अशोक की मृत्यु –

मौर्य वंश के महान सम्राट अशोक की मृत्यु 237 या 236 ई पू में हुई थी। उसके अगले पांच दशक तक निकृष्ट उच्चाधिकारियों द्वारा मौर्य साम्राज्य पर शासन चलता रहा। जैन धर्म, बौद्ध धर्म तथा हिंदू धर्म के ग्रंथों में अशोक के उत्तराधिकारियों के बारे में परस्पर विरोधी विचार दिए गए हैं। पुराणों में अशोक के बाद 9 शासकों की चर्चा की गई है। कहा जाता है कि अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज पश्चिमी और पूर्वी भाग में बट गया था। पश्चिमी भाग पर को कुषाण शासन करते थे जबकि पूर्व भाग पर संप्रति का शासन था। पूर्वी भाग पर विहदब्रत का शासन था जिसे मौर्य शासन का अंतिम शासक बताया जाता है। 

इस तरह मौर्य वंश का अंत हो जाता है।

यह भी पढ़े : यह है कलयुग के जीवंत देवता हनुमान जी के स्वयंभू मंदिर मेहंदीपुर बालाजी का इतिहास

Archana Yadav

मुझे नए नए टॉपिक्स में लेख लिखना पसंद हें, मेरे लेख पढ़ने के लिए शुक्रिया आपको केसा लगा कॉमेंट करके ज़रूर बताए.

Related Articles

Back to top button